हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह क़ुरबान अली दरी नजफ़ाबादी ने आज अपने उच्चस्तरीय धार्मिक पाठ के दौरान नहजुल बलाग़ा के शुरुआती ख़ुत्बों का उल्लेख करते हुए पैग़म्बरों के भेजे जाने की दर्शनशास्त्रीय वजह, इंसान की पैदाइश के उद्देश्य और पैग़म्बरों की मासूमियत के स्थान को स्पष्ट किया। उन्होंने इन विषयों को इस्लामी ज्ञानमीमांसा और मानवशास्त्र के महत्वपूर्ण आधारों में से बताया हैं।
उन्होंने आगे पवित्र क़ुरआन की आयत «इन्ना क़द फ़तन्ना क़ौमका मिन बअदिका वअदललहुमुस्सामिरी» (ताहा: 85) का उल्लेख करते हुए हज़रत मूसा (अ.स.) की अनुपस्थिति में सामरी द्वारा बनी इस्राईल को गुमराह किए जाने की घटना का ज़िक्र किया।
उन्होंने कहा कि मीक़ात से लौटने के बाद हज़रत मूसा (अ.स.) ने हज़रत हारून (अ.) से बहुत क्रोधित होकर बात की, लेकिन हज़रत हारून (अ.) ने जवाब दिया: «या इब्न उम्मि ला तअख़ुज़ बिहिल्यती वला बिरअसी»। उन्होंने बताया कि उन्होंने बनी इस्राईल में फूट और मतभेद पैदा होने के डर से नरमी और धैर्य का रास्ता अपनाया था।
इस घटना को इस्लामी समाज के लिए महत्वपूर्ण संदेश बताते हुए कहा कि अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ.स.) ने भी ख़िलाफ़त के मामले में अपने अधिकार और सत्यता पर दृढ़ विश्वास रखते हुए, इस्लाम के बड़े हितों तथा नवोदित इस्लामी समाज को टूटने से बचाने के लिए सशस्त्र संघर्ष से परहेज़ किया और ऐसी दूरदर्शी नीति अपनाई, जिससे धर्म की बुनियाद और उम्मत की एकता सुरक्षित रहे।
आयतुल्लाह दरी नजफ़ाबादी ने दुश्मनों की साज़िशों के प्रति चेतावनी देते हुए कहा कि आज अमेरिका और इस्राईली शासन मुस्लिम राष्ट्रों के विरुद्ध मोर्चाबंदी किए हुए हैं और उनका मुख्य उद्देश्य मुसलमानों के बीच मतभेद और आंतरिक संघर्ष पैदा करना है।
यदि हम समाज के वास्तविक और महत्वपूर्ण हितों को सही ढंग से पहचानने में असफल रहे, तो बाहरी दुश्मन का सामना करने के बजाय आपस की खींचतान में उलझ सकते हैं और यही दुश्मन की इच्छा है।
उन्होंने अपने भाषण के एक अन्य हिस्से में मक्का पर अब्रहा के हमले और अब्दुल मुत्तलिब के साथ उसकी बातचीत की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि जब अब्रहा ने अब्दुल मुत्तलिब से पूछा कि तुम्हारी क्या इच्छा है, तो उन्होंने कहा कि मेरे ऊंटों को छोड़ दिया जाए। अब्रहा को आश्चर्य हुआ कि वह काबा की सुरक्षा की बात क्यों नहीं कर रहे हैं। इस पर अब्दुल मुत्तलिब ने कहा:
«अना रब्बुल-इबलि, वलिल-बैति रब्बुन सयम्नउहु»
“मैं ऊंटों का मालिक हूँ और इस घर का भी एक मालिक है, जो स्वयं इसकी रक्षा करेगा।
इसके बाद अल्लाह का अज़ाब अबाबील पक्षियों के रूप में आया और अब्रहा की सेना को नष्ट कर दिया।
केंद्रीय प्रांत में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि ने इस घटना से मिलने वाले सबक बताते हुए कहा कि बड़े संकटों के समय शांति बनाए रखते हुए परिस्थितियों को सही ढंग से समझना और प्राथमिकताओं को पहचानना आवश्यक है। इस तरह निर्णय लिया जाना चाहिए कि दुश्मन इस्लामी समाज को उसके मूल मार्ग से भटका न सके।
अंत में उन्होंने मौजूदा संवेदनशील परिस्थितियों में सतर्कता, एकता और हर प्रकार के फूट पैदा करने वाले कदम से बचने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।
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